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मौत जब तक नज़र नहीं आती | शाही शायरी
maut jab tak nazar nahin aati

ग़ज़ल

मौत जब तक नज़र नहीं आती

जिगर बरेलवी

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मौत जब तक नज़र नहीं आती
ज़िंदगी राह पर नहीं आती

तर्क-ए-तदबीर भी नहीं आसाँ
रास तदबीर अगर नहीं आती

मरकज़-ए-दिल पे जो नहीं क़ाएम
वो नज़र राह पर नहीं आती

दिल को लज़्ज़त-शनास-ए-ग़म कर लें
मौत हम को अगर नहीं आती

जिस ने तेरी नज़र को देख लिया
उस को दुनिया नज़र नहीं आती

वो कभी मेहरबान हो जाता
ऐसी सूरत नज़र नहीं आती

जीते जी के हैं सारे हंगामे
मर के फिर कुछ ख़बर नहीं आती

आह क्या हो गया ज़माने को
अब मुरव्वत नज़र नहीं आती

है उन्हें तो वक़ार-ए-इज्ज़-ओ-नियाज़
वो तमन्ना जो बर नहीं आती

ज़िंदगी से निबाहे जाएँगे
मौत जब तक नज़र नहीं आती

अश्क-ए-पैहम 'जिगर' नहीं थमते
राह पर चश्म-ए-तर नहीं आती