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मौत अपनी जान ऐ दिल गर्दिश-ए-अफ़्लाक को | शाही शायरी
maut apni jaan ai dil gardish-e-aflak ko

ग़ज़ल

मौत अपनी जान ऐ दिल गर्दिश-ए-अफ़्लाक को

मीर कल्लू अर्श

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मौत अपनी जान ऐ दिल गर्दिश-ए-अफ़्लाक को
डूबने का ख़ौफ़ है गिर्दाब में तैराक को

ख़ुद ख़जिल हो जिस को रौशन-दिल से हो नाहक़ ग़ुबार
मुँह पे पड़ती है जो मुँह पर फेंकते हैं ख़ाक को

मर गए पर भी तह-ओ-बाला रहा अपना ग़ुबार
शीशा-ए-साअत में रखते हैं हमारी ख़ाक को

बस्ता-ए-फ़ितराक होते हैं हज़ारों बुलबुलें
जान कर बाब-ए-गुलिस्ताँ हल्क़ा-ए-फ़ितराक को

क्या अजब गर उस्तुख़्वाँ रौशन हों दाग़-ए-इश्क़ से
इक शरर शोला बनाता है ख़स-ओ-ख़ाशाक को

ख़ूब सा जी खोल कर आवारा कर ऐ इश्क़-ए-यार
ख़ौफ़-ए-रुस्वाई नहीं असलन दिल-ए-बेबाक को

हिज्र में पीता हूँ ख़ून-ए-दिल मय-ए-गुलगूँ की रंग
दौर-ए-साग़र जानता हूँ गर्दिश-ए-अफ़्लाक को

क्या नहीं ताज़ीर मिलती है गुनाह-ए-इश्क़ की
आतिश-ए-फ़ुर्क़त जहन्नम है दिल-ए-ग़मनाक को

कीजिए नाले ब-रंग-ए-बुलबुल ऐ दिल गर कभी
टुकड़े टुकड़े मिस्ल-ए-गुल कर ले तेरी पोशाक को

रौंद डाला है ज़मीन-ए-शेर से ता-चर्ख़-ए-फ़िक्र
रोक ले 'अर्श' अब अनान-ए-तौसन-ए-चालाक को