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मौसमों में हुई है साज़िश फिर | शाही शायरी
mausamon mein hui hai sazish phir

ग़ज़ल

मौसमों में हुई है साज़िश फिर

मुनीर सैफ़ी

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मौसमों में हुई है साज़िश फिर
धूप में हो रही है बारिश फिर

अब तो बाक़ी है सम्त-ए-ममनूअा'
मेरे तलवों में जागी ख़ारिश फिर

हर तरफ़ है अजीब ताराजी
दिल में आई सिपाह-ए-दानिश फिर

रंग-ओ-रोग़न भी मुस्कुराने लगे
ख़ुश बहुत है मिरी रिहाइश फिर

आड़ी-तिरछी लकीरें रौशन हों
कुछ तो हो सूरत-ए-निगारिश फिर

देखिए किस तरफ़ को जाता है
है क़लंदर की आज़माइश फिर

ज़हर-आलूद ख़ुशबुएँ हैं 'मुनीर'
की हवा ने गुलों से साज़िश फिर