EN اردو
मौसम-ए-गुल में नहीं इज़्ज़त-ओ-शान-ए-वाइ'ज़ | शाही शायरी
mausam-e-gul mein nahin izzat-o-shan-e-waiz

ग़ज़ल

मौसम-ए-गुल में नहीं इज़्ज़त-ओ-शान-ए-वाइ'ज़

मीर कल्लू अर्श

;

मौसम-ए-गुल में नहीं इज़्ज़त-ओ-शान-ए-वाइ'ज़
कौन इस फ़स्ल में सुनता है बयान-ए-वाइ'ज़

दुख़्तर-ए-रज़ की मज़म्मत का इरादा तो करे
खींच लूंगा अभी गुद्दी से ज़बान-ए-वाइ'ज़

आज रिंदान-ए-क़दह-नोश को अच्छी सूझी
मय-कशी के लिए ताका है मकान-ए-वाइ'ज़

मौसम-ए-गुल में जो सुनता हूँ'' तो मैं कहता हूँ
है सदा-ए-सग-ए-दीवाना बयान-ए-वाइ'ज़

ग़ूल-ए-सहरा-ए-शरीअ'त उसे बतला देंगे
हम से पूछे तो कोई नाम-ओ-निशान-ए-वाइ'ज़

दौर रिंदों का है चलती है शब-ओ-रोज़ शराब
अहद-ए-क़ाज़ी है न बाक़ी न ज़बान-ए-वाइ'ज़

क़त्ल कर डालिए हर-दम ये ख़याल आता है
जोश खाता है लहू सुन के बयान-ए-वाइ'ज़

कब्क की तरह ये लोटे अभी अँगारों पर
भट्टियां मय की जो हों ज़हर-ए-मकान-ए-वाइ'ज़

शुक्र है मौसम-ए-गुल का असर इतना तो हुआ
मय-कदा अब नज़र आता है मकान-ए-वाइ'ज़

बदले दुंबे के करें रिंद उसी को क़ुर्बान
ईद-ए-क़ुर्बां में जो सुन पाएँ बयान-ए-वाइ'ज़

'अर्श' इस फ़स्ल-ए-जुनूँ में मिरे सौदे की तरह
और बढ़ जाए इलाही ख़फ़क़ान-ए-वाइ'ज़