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मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो | शाही शायरी
mausam-e-gul kunj-e-gulshan nikhat-e-gesu na ho

ग़ज़ल

मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो

सुलतान रशक

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मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो
अब यही ख़्वाहिश है तस्कीं का कोई पहलू न हो

मैं कि तेरी रूह का इज़हार हूँ मुमकिन नहीं
तेरी बातों में मिरे अफ़्कार की ख़ुशबू न हो

ऐ सना-ख़्वान-ए-तजल्ली ये भी सोचा है कभी
ये सरासीमा तजल्ली रात का जादू न हो

इम्तिहान-ए-तिश्नगी की मंज़िल-ए-आख़िर है ये
ऐ दिल-ए-ना-आक़ेबत-अंदेश बे-क़ाबू न हो

मैं फ़रोग़-ए-बज़्म-ए-इम्काँ मैं अमीर-ए-कारवाँ
मैं ग़रीब-ए-शहर-ए-ना-पुर्सां जो मेरा तू न हो

हम ने देखे ज़िंदगी में ऐसे भी लम्हात जब
ज़ब्त का याराना हो और आँख में आँसू न हो

'रश्क'-साहब मैं असीर-ए-जुर्म-ए-ना-मा'लूम हूँ
कैसे मुमकिन है मुझे नाकामियों की ख़ू न हो