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मौसम-ए-ग़म गुज़र न जाए कहीं | शाही शायरी
mausam-e-gham guzar na jae kahin

ग़ज़ल

मौसम-ए-ग़म गुज़र न जाए कहीं

शीन काफ़ निज़ाम

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मौसम-ए-ग़म गुज़र न जाए कहीं
शब में सूरज निकल न आए कहीं

अपनी तन्हाइयाँ छुपाने को
बुत बनाए सनम गिराए कहीं

वो सरापा है ख़्वाब ख़ुश्बू का
झोंका झोंका बिखर न जाए कहीं

डर ये कैसा हुआ सफ़र में मुझे
रास्ता ख़त्म हो न जाए कहीं

क्या बताऊँ वो क्यूँ परेशाँ है
मुझ को ढूँडे कहीं छुपाए कहीं

सब इसी धुन में भागे जाते हैं
कोई आगे निकल न जाए कहीं

बा'द मुद्दत के तू मिला है 'निज़ाम'
डर है फिर से बिछड़ न जाए कहीं