मौसम-ए-ग़म गुज़र न जाए कहीं
शब में सूरज निकल न आए कहीं
अपनी तन्हाइयाँ छुपाने को
बुत बनाए सनम गिराए कहीं
वो सरापा है ख़्वाब ख़ुश्बू का
झोंका झोंका बिखर न जाए कहीं
डर ये कैसा हुआ सफ़र में मुझे
रास्ता ख़त्म हो न जाए कहीं
क्या बताऊँ वो क्यूँ परेशाँ है
मुझ को ढूँडे कहीं छुपाए कहीं
सब इसी धुन में भागे जाते हैं
कोई आगे निकल न जाए कहीं
बा'द मुद्दत के तू मिला है 'निज़ाम'
डर है फिर से बिछड़ न जाए कहीं
ग़ज़ल
मौसम-ए-ग़म गुज़र न जाए कहीं
शीन काफ़ निज़ाम

