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मौला किसी को ऐसा मुक़द्दर न दीजियो | शाही शायरी
maula kisi ko aisa muqaddar na dijiyo

ग़ज़ल

मौला किसी को ऐसा मुक़द्दर न दीजियो

जव्वाद शैख़

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मौला किसी को ऐसा मुक़द्दर न दीजियो
दिलबर नहीं तो फिर कोई दीगर न दीजियो

अपने सवाल सहल न लगने लगें उसे
आते भी हों जवाब तो फ़र-फ़र न दीजियो

चादर वो दीजियो उसे जिस पर शिकन न आए
जिस पर शिकन न आए वो बिस्तर न दीजियो

आए न कार-ए-शुक्र-गुज़ारी पे कोई हर्फ़
जब दीजियो तो ज़र्फ़ से बढ़ कर न दीजियो

बिखराओ कुछ नहीं भी सिमटते मिरे अज़ीज़
अपने किसी ख़याल को पैकर न दीजियो

तफ़रीक़ रहने दीजियो तारीफ़-ओ-तंज़ में
अब के शराब ज़हर मिला कर न दीजियो

या दिल से तर्क कीजियो दस्तार का ख़याल
या उस मुआ'मले में कभी सर न दीजियो

कहियो कि तू ने ख़ूब बनाई है काएनात
लेकिन उसे लिखाई के नंबर न दीजियो

मेआ'र से सिवा यहाँ रफ़्तार चाहिए
'जव्वाद' उस को आख़िरी ओवर न दीजियो