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मौज-दर-मौज नज़र आता था सैलाब मुझे | शाही शायरी
mauj-dar-mauj nazar aata tha sailab mujhe

ग़ज़ल

मौज-दर-मौज नज़र आता था सैलाब मुझे

मुर्तज़ा बिरलास

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मौज-दर-मौज नज़र आता था सैलाब मुझे
पाँव डाला तो ये दरिया मिला पायाब मुझे

बुत तो दुनिया ने ब-हर-गाम तराशे लेकिन
सर झुकाने के न आए कभी आदाब मुझे

शिद्दत-ए-कर्ब से कुम्हला गए चेहरे के ख़ुतूत
अब न पहचान सकेंगे मिरे अहबाब मुझे

एक साया कि मुझे चैन से सोने भी न दे
एक आवाज़ कि करती रहे बेताब मुझे

जिस की ख़्वाहिश में किसी बात की ख़्वाहिश न रहे
ऐसी जन्नत के दिखाए न कोई ख़्वाब मुझे

वुसअ'तें दामन-ए-सहरा को भी बख़्शी होतीं
तू ने बख़्शी थी अगर फ़ितरत-ए-सीमाब मुझे