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मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं | शाही शायरी
masrur bhi hun KHush bhi hun lekin KHushi nahin

ग़ज़ल

मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं

बहज़ाद लखनवी

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मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं
तेरे बग़ैर ज़ीस्त तो है ज़िंदगी नहीं

मैं दर्द-ए-आशिक़ी को समझता हूँ जान-ओ-रूह
कम्बख़्त वो भी दिल में कभी है कभी नहीं

ला ग़म ही डाल दे मिरे दस्त-ए-सवाल में
मैं क्या करूँ ख़ुशी को जो तेरी ख़ुशी नहीं

कुछ देर और रहने दे ख़ुद्दारी-ए-जुनूँ
दामन तो चाक होना है लेकिन अभी नहीं

साक़ी निगाह-ए-नाज़ से लिल्लाह काम ले
सौ जाम पी चुका हूँ मगर बे-ख़ुदी नहीं

रखना पड़ेगी तुम को तही-दामनी की लाज
मुझ को कमी ज़रूर है तुम को कमी नहीं

'बहज़ाद' साफ़ साफ़ मैं कहता हूँ हाल-ए-दिल
शर्मिंदा-ए-कमाल मिरी शाइ'री नहीं