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मस्लूब आफ़्ताब सर-ए-शाम क्यूँ हुआ | शाही शायरी
maslub aaftab sar-e-sham kyun hua

ग़ज़ल

मस्लूब आफ़्ताब सर-ए-शाम क्यूँ हुआ

हमदम कशमीरी

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मस्लूब आफ़्ताब सर-ए-शाम क्यूँ हुआ
होना था हादिसा तो लब-ए-बाम क्यूँ हुआ

जिस पर किसी जगह भी मिरे दस्तख़त न थे
मंसूब मेरे नाम वो पैग़ाम क्यूँ हुआ

वो कौन था जो हाथ मिला कर निकल गया
बरपा हिसार-ए-जिस्म में कोहराम क्यूँ हुआ

बे-राज़ रास्ते हैं मनाज़िर उदास हैं
क़िस्तों में मेरे शहर का नीलाम क्यूँ हुआ

रुत्बा मिला न क्यूँ उसे अपनों के दरमियाँ
बाहर था ख़ास अगर वो यहाँ आम क्यूँ हुआ

फूलों की वादियों की तरावत मिली उन्हें
और क़हर-ए-रेग-ज़ार मिरे नाम क्यूँ हुआ

आँखों पे मुझ को अपनी भरोसा नहीं रहा
इतना ख़राब ख़्वाब का अंजाम क्यूँ हुआ