मस्लूब आफ़्ताब सर-ए-शाम क्यूँ हुआ
होना था हादिसा तो लब-ए-बाम क्यूँ हुआ
जिस पर किसी जगह भी मिरे दस्तख़त न थे
मंसूब मेरे नाम वो पैग़ाम क्यूँ हुआ
वो कौन था जो हाथ मिला कर निकल गया
बरपा हिसार-ए-जिस्म में कोहराम क्यूँ हुआ
बे-राज़ रास्ते हैं मनाज़िर उदास हैं
क़िस्तों में मेरे शहर का नीलाम क्यूँ हुआ
रुत्बा मिला न क्यूँ उसे अपनों के दरमियाँ
बाहर था ख़ास अगर वो यहाँ आम क्यूँ हुआ
फूलों की वादियों की तरावत मिली उन्हें
और क़हर-ए-रेग-ज़ार मिरे नाम क्यूँ हुआ
आँखों पे मुझ को अपनी भरोसा नहीं रहा
इतना ख़राब ख़्वाब का अंजाम क्यूँ हुआ
ग़ज़ल
मस्लूब आफ़्ताब सर-ए-शाम क्यूँ हुआ
हमदम कशमीरी

