मशवरा देने की कोशिश तो करो
मेरे हक़ में कोई साज़िश तो करो
जब किसी महफ़िल में मेरा ज़िक्र हो
चुप रहो इतनी नवाज़िश तो करो
मेरा कहना हर्फ़-ए-आख़िर भी नहीं
मेरी मानो आज़माइश तो करो
ख़ुद-सताई शेवा-ए-इबलीस है
नज़्र-ए-हक़ हर्फ़-ए-सताइश तो करो
चार-सू ज़ुल्मत के पहरे-दार हैं
रहमतों की हम पे बारिश तो करो
ग़ज़ल
मशवरा देने की कोशिश तो करो
फ़ारूक़ नाज़की

