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मरहला तय कोई बे-मिन्नत-ए-जादा भी तो हो | शाही शायरी
marhala tai koi be-minnat-e-jada bhi to ho

ग़ज़ल

मरहला तय कोई बे-मिन्नत-ए-जादा भी तो हो

गौहर होशियारपुरी

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मरहला तय कोई बे-मिन्नत-ए-जादा भी तो हो
ग़म बढ़े भी तो सही दर्द ज़ियादा भी तो हो

ऐसी मुश्किल तो नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्ख़ीर
सर में सौदा भी तो हो दिल में इरादा भी तो हो

ज़ेहन का मश्वरा-ए-तर्क-ए-तलब भी बर-हक़
ज़ेहन की बात क़ुबूल-ए-दिल-ए-सादा भी तो हो

कहीं बादल कहीं सूरज कहीं साया कहीं धूप
मिरे माबूद तिरा कोई लबादा भी तो हो

प्यार में कम तो नहीं कम-निगही भी उस की
हाँ तुनक-ज़र्फ़ी-ए-एहसास कुशादा भी तो हो

आशिक़ी सरमद-ओ-मंसूर से कुछ ख़ास नहीं
मस्त लेकिन कोई बे-ज़हमत-ए-बादा भी तो हो

ज़र्फ़-ए-ईज़ा-तलबी ग़म भी परख लें 'गौहर'
उस से इक रोज़ न मिलने का इरादा भी तो हो