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मंज़िलों से बेगाना आज भी सफ़र मेरा | शाही शायरी
manzilon se begana aaj bhi safar mera

ग़ज़ल

मंज़िलों से बेगाना आज भी सफ़र मेरा

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

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मंज़िलों से बेगाना आज भी सफ़र मेरा
रात बे-सहर मेरी दर्द बे-असर मेरा

गुमरही का आलम है किस को हम-सफ़र कहिए
थक के छोड़ बैठी है साथ रहगुज़र मेरा

वो फ़रोग़-ए-ख़ल्वत भी अंजुमन-सरापा भी
भर गया है फूलों से दामन-ए-नज़र मेरा

अब तिरे तग़ाफ़ुल से और क्या तलब कीजे
शौक़-ए-ना-रसा मेरा इश्क़-ए-मो'तबर मेरा

दौर-ए-कम-अयारी है कुछ पता नहीं चलता
कौन मेरा क़ातिल है कौन चारा-गर मेरा

ना-गुज़ीर हस्ती हैं फ़स्ल-ए-गुल के हंगामे
शोज़िश-ए-नुमू तेरी फ़ित्ना-ए-शरर मेरा

कुछ बताओ तो आख़िर क्या जवाब दूँ उस को
इक सवाल करता है रोज़ मुझ से घर मेरा

आसमाँ का शिकवा क्या वक़्त की शिकायत क्यूँ
ख़ून-ए-दिल से निखरा है और भी हुनर मेरा

दिल की बे-क़रारी ने होश खो दिए 'ताबाँ'
वर्ना आस्तानों पर कब झुका था सर मेरा