EN اردو
मंज़िल के ख़्वाब देखते हैं पाँव काट के | शाही शायरी
manzil ke KHwab dekhte hain panw kaT ke

ग़ज़ल

मंज़िल के ख़्वाब देखते हैं पाँव काट के

हिमायत अली शाएर

;

मंज़िल के ख़्वाब देखते हैं पाँव काट के
क्या सादा-दिल ये लोग हैं घर के न घाट के

अब अपने आँसुओं में हैं डूबे हुए तमाम
आए थे अपने ख़ून का दरिया जो पाट के

शहर-ए-वफ़ा में हक़्क़-ए-नमक यूँ अदा हुआ
महफ़िल में हैं लगे हुए पैवंद टाट के

खिंचती थी जिन के ख़ौफ़ से सद्द-ए-सिकंदरी
सोए नहीं हैं आज वो दीवार चाट के

अब तो दरिंदगी की नाश भी हुस्न है
दीवार पर सजाते हैं सर काट काट के