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मंज़िल दराज़-ओ-दूर है और हम में दम नहीं | शाही शायरी
manzil daraaz-o-dur hai aur hum mein dam nahin

ग़ज़ल

मंज़िल दराज़-ओ-दूर है और हम में दम नहीं

इस्माइल मेरठी

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मंज़िल दराज़-ओ-दूर है और हम में दम नहीं
हूँ रेल पर सवार तो दाम-ओ-दिरम नहीं

मैदान-ए-ज़िंदगी में करें दौड़-धूप किया
हम ऐसे ना-तवाँ हैं कि उठता क़दम नहीं

क्या ख़ूब हाथ पाँव ख़ुदा ने अता किए
चलते रहें तो हाजत ख़ील-ओ-ख़दम नहीं

अग़्यार क्यूँ दख़ील हैं बज़्म-ए-सुरूर में
माना कि यार कम हैं पर इतने तो कम नहीं

जब तक है इश्क़-ओ-आशिक़-ओ-माशूक़ में तमीज़
खुलता किसी पे राज़-ए-हदूस-ओ-क़िदम नहीं

आदम पे मो'तरिज़ हों फ़रिश्ते तो क्या अजब
चखी हनूज़ चाशनी-ए-ज़हर-ए-ग़म नहीं

इज़हार-ए-हाल का भी ज़रीया नहीं रहा
दिल इतना जल गया है कि आँखों में नम नहीं

तू ही नहीं है रम्ज़-ए-मोहब्बत से आश्ना
वर्ना दयार-ए-हुस्न में रस्म-ए-सितम नहीं

इरशाद-ए-तब्अ की न अगर पैरवी करे
नक़्क़ाशी-ए-ख़्याल मजाल-ए-क़लम नहीं

सर ही के बल गए हैं सदा रहरवान-ए-इश्क़
हैरत-ज़दा न बन कि निशान-ए-क़दम नहीं

कैसी तलब कहाँ की तलब किस लिए तलब
हम हैं तो वो नहीं है जो वो है तो हम नहीं