मंज़िल दराज़-ओ-दूर है और हम में दम नहीं
हूँ रेल पर सवार तो दाम-ओ-दिरम नहीं
मैदान-ए-ज़िंदगी में करें दौड़-धूप किया
हम ऐसे ना-तवाँ हैं कि उठता क़दम नहीं
क्या ख़ूब हाथ पाँव ख़ुदा ने अता किए
चलते रहें तो हाजत ख़ील-ओ-ख़दम नहीं
अग़्यार क्यूँ दख़ील हैं बज़्म-ए-सुरूर में
माना कि यार कम हैं पर इतने तो कम नहीं
जब तक है इश्क़-ओ-आशिक़-ओ-माशूक़ में तमीज़
खुलता किसी पे राज़-ए-हदूस-ओ-क़िदम नहीं
आदम पे मो'तरिज़ हों फ़रिश्ते तो क्या अजब
चखी हनूज़ चाशनी-ए-ज़हर-ए-ग़म नहीं
इज़हार-ए-हाल का भी ज़रीया नहीं रहा
दिल इतना जल गया है कि आँखों में नम नहीं
तू ही नहीं है रम्ज़-ए-मोहब्बत से आश्ना
वर्ना दयार-ए-हुस्न में रस्म-ए-सितम नहीं
इरशाद-ए-तब्अ की न अगर पैरवी करे
नक़्क़ाशी-ए-ख़्याल मजाल-ए-क़लम नहीं
सर ही के बल गए हैं सदा रहरवान-ए-इश्क़
हैरत-ज़दा न बन कि निशान-ए-क़दम नहीं
कैसी तलब कहाँ की तलब किस लिए तलब
हम हैं तो वो नहीं है जो वो है तो हम नहीं
ग़ज़ल
मंज़िल दराज़-ओ-दूर है और हम में दम नहीं
इस्माइल मेरठी

