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मल्बूस-ए-ग़ुबार याद रखना | शाही शायरी
malbus-e-ghubar yaad rakhna

ग़ज़ल

मल्बूस-ए-ग़ुबार याद रखना

फ़रासत रिज़वी

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मल्बूस-ए-ग़ुबार याद रखना
ये राहगुज़ार याद रखना

इक शाम-ए-ख़िज़ाँ यहीं कहीं है
ऐ सुब्ह-ए-बहार याद रखना

हम कश्ती-ए-इश्क़ के मुसाफ़िर
उतरे नहीं पार याद रखना

ऐ ज़ख़्मा-वरान-ए-बरबत-ए-दिल
टूटे हुए तार याद रखना

पतझड़ की हवाएँ चीख़ती हैं
क्या सौत-ए-हज़ार याद रखना

हम जाते हैं बार-ए-ग़म उठाए
ऐ शहर-ए-निगार याद रखना

इबरत का मक़ाम है ये दुनिया
वीरान दयार याद रखना

ऐ वादी-ए-गुल को जाने वाले
रस्तों के ये ख़ार याद रखना

मिलती है ग़मों से भी बसीरत
ज़ख़्मों का शुमार याद रखना

बचपन के मकाँ का नख़्ल-ए-हमराज़
ये हार सिंघार याद रखना

ये हर्फ़ है रौशनी-ए-फ़र्दा
हर्फ़ सर-ए-दार याद रखना

शायद मैं ये ख़्वाब भूल जाऊँ
तुम ऐ मिरे यार याद रखना