मकाँ से ला-मकाँ तक आ गए हैं
कहाँ से हम कहाँ तक आ गए हैं
जहाँ जलते हैं पर होश-ओ-ख़िरद के
जुनूँ में हम वहाँ तक आ गए हैं
भड़क उट्ठी है कैसी आतिश-ए-गुल
शरारे आशियाँ तक आ गए हैं
ख़ुलूस-ए-दोस्ती पर मरने वाले
हयात-ए-जाविदाँ तक आ गए हैं
हमारी गुम-रही मंज़िल निशाँ है
तजस्सुस में कहाँ तक आ गए हैं
वहाँ दिल में मोहब्बत की कमी है
जहाँ शिकवे ज़बाँ तक आ गए हैं
तमाशा-ए-बहार-ए-गुल की शैदा
बहार-ए-गुल-रुख़ाँ तक आ गए हैं
मक़ाम अपना नहीं मा'लूम लेकिन
जहाँ तुम हो वहाँ तक आ गए हैं
किसी के जल्व-हा-ए-हैरत-अंगेज़
नज़र के इम्तिहाँ तक आ गए हैं
न पहुँचे ख़ाना-ए-दिल के मकीं तक
ज़मीं से आसमाँ तक आ गए हैं
गुज़र कर हम ख़ुदी वहम-ओ-गुमाँ से
ख़ुदा जाने कहाँ तक आ गए हैं
'रिशी' मंज़िल नहीं अब दूर हम से
ग़ुबार-ए-कारवाँ तक आ गए हैं
ग़ज़ल
मकाँ से ला-मकाँ तक आ गए हैं
ऋषि पटियालवी

