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मैं वो बे-चारा हूँ जिस से बे-कसी मानूस है | शाही शायरी
main wo be-chaara hun jis se be-kasi manus hai

ग़ज़ल

मैं वो बे-चारा हूँ जिस से बे-कसी मानूस है

शाद लखनवी

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मैं वो बे-चारा हूँ जिस से बे-कसी मानूस है
जो हथेली हाथ में है इक कफ़-ए-अफ़सोस है

इस क़दर रंज-ए-सियह-बख़्ती से हूँ ज़ार-ओ-नहीफ़
दो-क़दम चलना भी जिस को एक काले कोस है

आसमाँ नान-ए-जवीं भी दे तो ने'मत जानिए
पाओ-रोटी भी जो हाथ आए समझे तोस है

ग़ैर के ख़ातिर धरा जाता हूँ मैं मुफ़्त-ए-ख़ुदा
कोई मुल्ज़िम हो वो बुत देता मुझी को दोस है

'शाद' आसा है उसे भी बोसा-ए-लब की हवस
बुल-हवस भी ऐ शकर-लब एक ही लहलूस है