मैं ने उस को बर्फ़ दिनों में देखा था
उस का चेहरा सूरज जैसा लगता था
यूँ भी नज़रें आपस में मिल लेती थीं
वो भी पहरों चाँद को तकता रहता था
वो गलियाँ वो रस्ते कितने अच्छे थे
जब वो नंगे पाँव घूमा करता था
चारों-जानिब उस की ख़ुश्बू बिखरी थी
हिज्र का इक मौसम भी उस के जैसा था
दूर कहीं आवाज़ के घुंघरू बजते थे
और मैं कान लगाए सुनता रहता था
सब्ज़ रुतों में अक्सर मुझ को याद आया
उस ने ख़त में सूखा पत्ता भेजा था
ग़ज़ल
मैं ने उस को बर्फ़ दिनों में देखा था
हसन रिज़वी

