मैं ख़ुद ही ख़्वाब-ए-इश्क़ की ताबीर हो गया
गोया हर इक बशर तिरी तस्वीर हो गया
अपने किए को आ के ज़रा देख तीर-गर
तर ख़ून-ए-दिल से दामन-ए-नख़चीर हो गया
फिर पेश आ गया वही दिलचस्प हादिसा
दिल फिर किसी के दाम में तस्ख़ीर हो गया
ये वज़्-ए-आशिक़ान ये अंदाज़-ए-एहतिराम
आख़िर मिरा ख़याल उसे दिल-गीर हो गया
आसूदगी नसीब सलीमुत्तबअ' हूँ मैं
मुझ को ग़रीब-ख़ाना ही कश्मीर हो गया
वाबस्ता मुझ से होना है ख़ुद वज्ह-ए-आफ़ियत
दीवाना तेरा वाली-ए-तक़दीर हो गया
तफ़रीद ख़ुद ज़रीया-ए-जाह-ओ-जलाल है
मैं तेरा हो के साहब-ए-तौक़ीर हो गया
तो ख़ूब जानता है कि मैं कौन था कभी
और देख अब कि क्या फ़लक-ए-पीर हो गया
होना था हश्र-ए-हसरत-ओ-हिर्मां अगर यही
'रहबर' ज़ह-ए-नसीब कि तू पीर हो गया
ग़ज़ल
मैं ख़ुद ही ख़्वाब-ए-इश्क़ की ताबीर हो गया
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर

