EN اردو
मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो | शाही शायरी
main kaise jiyun gar ye duniya har aan nai taswir na ho

ग़ज़ल

मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो

उबैदुल्लाह अलीम

;

मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो
ये आते जाते रंग न हों और लफ़्ज़ों की तनवीर न हो

ऐ राह-ए-इश्क़ के राही सुन चल ऐसे सफ़र की लज़्ज़त में
तिरी आँखों में नए ख़्वाब तो हों पर ख़्वाबों की ताबीर न हो

घर आऊँ या बाहर जाऊँ हर एक फ़ज़ा में मेरे लिए
इक झूटी सच्ची चाहत हो रस्मों की कोई ज़ंजीर न हो

जैसे ये मिरी अपनी सूरत मिरे सामने हो और कहती हो
मिरे शाएर तेरे साथ हूँ मैं मायूस न हो दिल-गीर न हो

कोई हो तो मोहब्बत ऐसी हो मुझे धूप और साए में जिस के
किसी जज़्बे का आज़ार न हो किसी ख़्वाहिश की ताज़ीर न हो