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मैं कहाँ तक तुझे सफ़ाई दूँ | शाही शायरी
main kahan tak tujhe safai dun

ग़ज़ल

मैं कहाँ तक तुझे सफ़ाई दूँ

शाहिद कमाल

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मैं कहाँ तक तुझे सफ़ाई दूँ
ख़ुद को इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई दूँ

तुझ से मैं दुश्मनी शदीद करूँ
प्यार भी तुझ को इंतिहाई दूँ

ए मिरी जान गर इजाज़त हो
ज़ख़्म को इज़्न-ए-लब-कुशाई दूँ

ज़िंदगी तुझ को ए'तिबार नहीं
अपने होने की मैं गवाही दूँ

मुझ को ख़ुद मेरे पास ले आना
मैं तुझे गर कहीं दिखाई दूँ

इक ज़माना है गोश-बर-आवाज़
इक ज़माने को मैं सुनाई दूँ

वा करूँ तुझ पे मंज़िल-ए-इदराक
फिर तुझे ज़ौक़-ए-ना-रसाई दूँ