मैं दरिया-ए-क़नाअ'त-आश्ना हूँ
मैं मौज-ए-निशान-ए-बोरिया हूँ
मैं आशिक़-ए-चश्म-ए-सुर्मा-सा हूँ
गर ख़ाक भी हूँ तो तूतिया हूँ
तिफ़्ली ही से वहशत-आश्ना हूँ
मैं उस दामन-ए-दश्त में पला हूँ
देखे जो मुझे जहाँ को देखे
मैं आइना-ए-जहाँ-नुमा हूँ
चल सकते नहीं जो बाग़ तक भी
ताऊस-सिफ़त अदू-ए-पा हूँ
दीवाना जो हूँ तो हूँ मैं ख़ामोश
ज़ंजीर जो हूँ तो बे-सदा हूँ
ता-गोर भी सिफ़त से न पहुँचूँ
बिल-फ़र्ज़ अगर हज़ार पा हूँ
सोहबत हो बरआर किस तरह यार
तू शाह है और मैं गदा हूँ
हर शे'र में ज़ुल्फ़ की है तारीफ़
इस बहर में मौज-आश्ना हूँ
सुनता नहीं एक बुत मिरा हाल
फ़रियादी तुझ से ऐ ख़ुदा हूँ
कहती है ज़बान-ए-हाल से मौत
मैं दर्द-ए-फ़िराक़ की दवा हूँ
कहती है ये रूह तन से हर-दम
तू ख़ाक जो हो तो मैं दवा हूँ
ये तौसन-ए-उम्र गर्म-रफ़तार
कहता है मैं अब चराग़-पा हूँ
ऐ 'अर्श' ज़ियारत अब करूँगा
मैं रह-रव-ए-दश्त-ए-कर्बला हूँ
ग़ज़ल
मैं दरिया-ए-क़नाअ'त-आश्ना हूँ
मीर कल्लू अर्श

