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मैं दरिया-ए-क़नाअ'त-आश्ना हूँ | शाही शायरी
main dariya-e-qanaat-ashna hun

ग़ज़ल

मैं दरिया-ए-क़नाअ'त-आश्ना हूँ

मीर कल्लू अर्श

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मैं दरिया-ए-क़नाअ'त-आश्ना हूँ
मैं मौज-ए-निशान-ए-बोरिया हूँ

मैं आशिक़-ए-चश्म-ए-सुर्मा-सा हूँ
गर ख़ाक भी हूँ तो तूतिया हूँ

तिफ़्ली ही से वहशत-आश्ना हूँ
मैं उस दामन-ए-दश्त में पला हूँ

देखे जो मुझे जहाँ को देखे
मैं आइना-ए-जहाँ-नुमा हूँ

चल सकते नहीं जो बाग़ तक भी
ताऊस-सिफ़त अदू-ए-पा हूँ

दीवाना जो हूँ तो हूँ मैं ख़ामोश
ज़ंजीर जो हूँ तो बे-सदा हूँ

ता-गोर भी सिफ़त से न पहुँचूँ
बिल-फ़र्ज़ अगर हज़ार पा हूँ

सोहबत हो बरआर किस तरह यार
तू शाह है और मैं गदा हूँ

हर शे'र में ज़ुल्फ़ की है तारीफ़
इस बहर में मौज-आश्ना हूँ

सुनता नहीं एक बुत मिरा हाल
फ़रियादी तुझ से ऐ ख़ुदा हूँ

कहती है ज़बान-ए-हाल से मौत
मैं दर्द-ए-फ़िराक़ की दवा हूँ

कहती है ये रूह तन से हर-दम
तू ख़ाक जो हो तो मैं दवा हूँ

ये तौसन-ए-उम्र गर्म-रफ़तार
कहता है मैं अब चराग़-पा हूँ

ऐ 'अर्श' ज़ियारत अब करूँगा
मैं रह-रव-ए-दश्त-ए-कर्बला हूँ