मैं करप्शन की फ़ज़ीलत को कहाँ समझा था
बहर-ए-ज़ुल्मात को छोटा सा कुआँ समझा था
फिर बजट उस ने गिराया है हथौड़े की तरह
वो हुकूमत को भी लोहे की दुकाँ समझा था
ताज-महलों की जगह तुम ने बनाईं क़ब्रें
लीडरो हम ने तुम्हें शाह-जहाँ समझा था
खिड़कियाँ तोड़ गया वो सभी जाते जाते
मेरे दिल को जो किराए का मकाँ समझा था
पाएँचे जींस के टख़नों से बहुत ऊपर थे
मैं सुरय्या को सुरय्या का मियाँ समझा था
माँ ने बेटी से कहा तेरी ख़ता है इस में
तू ने ससुराल में क्यूँ सास को माँ समझा था
यूँ बुढ़ापे में न तुम छोड़ के वापस जाओ
बीवीयो तुम ने कभी मुझ को मियाँ समझा था
ग़ज़ल
मैं करप्शन की फ़ज़ीलत को कहाँ समझा था
खालिद इरफ़ान

