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मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है | शाही शायरी
main bhi kab se chup baiTha hun wo bhi kab se chup baiThi hai

ग़ज़ल

मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है

अमीक़ हनफ़ी

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मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है
ये है विसाल की रस्म अनोखी ये मिलने की रीत नई है

वो जब मुझ को देख रही थी मैं ने उस को देख लिया था
बस इतनी सी बात थी लेकिन बढ़ते बढ़ते कितने बढ़ी है

बे-सूरत बे-जिस्म आवाज़ें अंदर भेज रही हैं हवाएँ
बंद हैं कमरे के दरवाज़े लेकिन खिड़की खुली हुई है

मेरे घर की छत के ऊपर सूरज आया चाँद भी उतरा
छत के नीचे के कमरों की जैसी थी औक़ात वही है