मैं अपने अज़ाब लिख रही थी
ज़ख़्मों का हिसाब लिख रही थी
फूलों की ज़बाँ की शाएरा थी
काँटों से गुलाब लिख रही थी
उस पेड़ के खोखले तने पर
इक उम्र के ख़्वाब लिख रही थी
आँखों से सवाल पढ़ रही थी
पलकों से जवाब लिख रही थी
हर बूँद शिकस्ता बाम-ओ-दर पर
बारिश का इताब लिख रही थी
इक नस्ल के ख़्वाब के लहू से
इक नस्ल के ख़्वाब लिख रही थी
फूलों में ढली हुई ये लड़की
पत्थर पे किताब लिख रही थी
ग़ज़ल
मैं अपने अज़ाब लिख रही थी
इशरत आफ़रीं

