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मय का ये एहतिराम अरे तौबा | शाही शायरी
mai ka ye ehtiram are tauba

ग़ज़ल

मय का ये एहतिराम अरे तौबा

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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मय का ये एहतिराम अरे तौबा
और फिर वो हराम अरे तौबा

दिल को सरमस्त कर ही देती है
याद-ए-साक़ी-ओ-जाम अरे तौबा

अल्लाह अल्लाह कर अरे ज़ाहिद
जाम-ए-मय सुब्ह-ओ-शाम अरे तौबा

बुत-परस्ती में जिस की उम्र कटी
ऐसे काफ़िर का नाम अरे तौबा

एक बे-जाँ के क़त्ल करने को
इस क़दर एहतिमाम अरे तौबा

ग़म-ज़दों की ये ख़ामुशी है ग़ज़ब
सब्र का इंतिक़ाम अरे तौबा

आज भूले से ले लिया किस ने
'शौक़'-ए-रुस्वा का नाम अरे तौबा