EN اردو
महफ़िल महफ़िल सन्नाटे हैं | शाही शायरी
mahfil mahfil sannaTe hain

ग़ज़ल

महफ़िल महफ़िल सन्नाटे हैं

अहमद राही

;

महफ़िल महफ़िल सन्नाटे हैं
दर्द की गूँज पे कान धरे हैं

दिल था शोर था हंगामे थे
यारो हम भी तुम जैसे हैं

मौज-ए-हवा में आग भरी है
बहते दरिया खौल उठे हैं

अरमानों के नर्म शगूफ़े
शाख़ों के हम-राह जले हैं

ये जो ढेर हैं ये जो खंडर हैं
माज़ी की गलियाँ-कूचे हैं

जिन को देखना बस में नहीं था
ऐसे भी मंज़र देखे हैं

कौन दिलों पर दस्तक देगा
यादों ने दम साध लिए हैं