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मद्धम हुई तो और निखरती चली गई | शाही शायरी
maddham hui to aur nikharti chali gai

ग़ज़ल

मद्धम हुई तो और निखरती चली गई

अमीर इमाम

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मद्धम हुई तो और निखरती चली गई
ज़िंदा है एक याद जो मरती चली गई

थी ज़िंदगी की मिस्ल शब-ए-हिज्र दोस्तो
और ज़िंदगी की मिस्ल गुज़रती चली गई

हम से यहाँ तो कुछ भी समेटा न जा सका
हम से हर एक चीज़ बिखरती चली गई

आए थे चंद ज़ख़्म गुज़र-गाह-ए-वक़्त पर
गुज़री हवा-ए-वक़्त तो भरती चली गई

इक अश्क क़हक़हों से गुज़रता चला गया
इक चीख़ ख़ामुशी में उतरती चली गई

हर रंग एक रंग से हम-रंग हो गया
तस्वीर ज़िंदगी की उभरती चली गई