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माथे पे लगा संदल वो हार पहन निकले | शाही शायरी
mathe pe laga sandal wo haar pahan nikle

ग़ज़ल

माथे पे लगा संदल वो हार पहन निकले

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

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माथे पे लगा संदल वो हार पहन निकले
हम खींच वहीं क़श्क़ा ज़ुन्नार पहन निकले

अल्लाह रे तिरी शोरिश ऐ फ़स्ल-ए-जुनूँ तुझ में
दीवानों की ज़ंजीरें होश्यार पहन निकले

आशिक़ के तईं अपने सज अपनी दिखाने को
मलमल का अंगरखा वो सौ बार पहन निकले

मर्ग़ूब-ए-जुनूँ पाई पोशाक न जब कोई
हम-जामा-ए-उर्यानी नाचार पहन निकले

क्यूँकर न 'हवस' जावे सदक़े फ़लक-ए-नीली
नीलम ही का सब गहना जब यार पहन निकले