मानूस फ़ितरतन हैं ग़म-ए-आशिक़ी से हम
फिर क्यूँ न तेरे नाज़ उठाएँ ख़ुशी से हम
जब से यक़ीं हुआ है वही कारसाज़ हैं
अब अपना हाल कहते नहीं हर किसी से हम
ख़ामोश ज़िंदगी भी दलील-ए-बहार है
ये दर्स ले रहे हैं चमन में कली से हम
ये और बात है कि हमें कुछ गिला भी है
मुंकिर नहीं मगर तिरी दरिया-दिली से हम
दिल-सोज़-ओ-दिल-ख़राश है ये जादा-ए-हयात
लेकिन गुज़र रहे हैं बड़ी सादगी से हम
ये फ़िक्र ये ख़याल 'अज़ीज़' आप का न हो
कुछ शे'र सुन रहे थे अभी 'वार्सी' से हम
ग़ज़ल
मानूस फ़ितरतन हैं ग़म-ए-आशिक़ी से हम
अज़ीज़ वारसी

