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माना कि तू सवार है और मैं पियादा हूँ | शाही शायरी
mana ki tu sawar hai aur main piyaada hun

ग़ज़ल

माना कि तू सवार है और मैं पियादा हूँ

रईस अमरोहवी

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माना कि तू सवार है और मैं पियादा हूँ
मुझ से हज़र न कर कि शनासा-ए-जादा हूँ

बातिन में सख़्त काफ़िर-ओ-पुर-पेच ओ तह-ब-तह
ज़ाहिर में एक हम-सफ़र-ए-सहल-ओ-सादा हूँ

इक शहर-ए-ज़र-निगार है अक़्लीम-ए-शर्क़ में
उस शहर-ए-ज़र-निगार का मैं शाहज़ादा हूँ

वा हैं दरीचा-हा-ए-ख़िरद मेरी रूह पर
किस ने कहा ख़राब-ए-ख़राबात-ओ-बादा हूँ

ऐ ख़िज़्र! क़ुत्ब-ए-वक़्त की ता-चंद जुस्तुजू
मेरा मुरीद हो कि क़वी-उल-इरादा हों

मैं हम-रह-ए-शमीम न उड़ता सबा के साथ?
उफ़्ताद तो यही है कि बर्ग-ए-फ़तादा हूँ

तीर-अफ़गनों की सफ़ है उधर और मैं इधर
सीना-सिपर 'रईस' ब-क़ल्ब-ए-कुशादा हूँ