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माइल-ए-ज़ब्त भी आमादा-ए-फ़रियाद भी है | शाही शायरी
mail-zabt bhi aamada-e-fariyaad bhi hai

ग़ज़ल

माइल-ए-ज़ब्त भी आमादा-ए-फ़रियाद भी है

अर्श मलसियानी

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माइल-ए-ज़ब्त भी आमादा-ए-फ़रियाद भी है
दिल गिरफ़्तार-ए-मोहब्बत भी है आज़ाद भी है

दास्तान-ए-दिल-ए-मायूस न पूछ ऐ हमदम
ये वो बस्ती है जो आबाद भी बर्बाद भी है

ऐ मिरे ज़ब्त को कामिल न समझने वाले
क़ाबिल-ए-दाद मिरी कोशिश-ए-फ़रियाद भी है

उड़ के जाऊँ भी तो क्या और न जाऊँ भी तो क्या
मुंतज़िर बर्क़ भी है ताक में सय्याद भी है

क्या लिखूँ क्या न लिखूँ सुर्ख़ी-ए-अफ़साना-ए-दिल
ग़म भी है दर्द भी हसरत भी है फ़रियाद भी है

दिल-ए-दीवाना की तो हस्ती-ए-हुशियार न पूछ
ये गिरफ़्तार-ए-क़फ़स ताइर-ए-आज़ाद भी है

मेरी तस्कीन तो कर भूल के इतना तो बता
याद रखने का जो वा'दा था तुझे याद भी है

इक 'रविश' दिल की हो ऐ 'अर्श' तो कुछ बात भी हो
क्या मुसीबत है कि ये शाद भी नाशाद भी है