मा-सिवा से कहीं बेगाना बनाया होता
अपने ही हुस्न का दीवाना बनाया होता
जाम साग़र सुबू ख़ुम-ख़ाना बनाया होता
ज़र्फ़-ए-दिल देख के पैमाना बनाया होता
लौ लगाता न किसी ग़ैर से ऐ शम-ए-हुस्न
तुम ने गर अपना ही परवाना बनाया होता
मेरी महरूमी-ए-क़िस्मत को जो सुन पाता रक़ीब
उतनी ही बात का अफ़्साना बनाया होता
पहले अल्लाह मुझे ज़ब्त की क़ुव्वत देता
फिर रहीन-ए-ग़म-ए-जानाना न बनाया होता
उन के हाथों पे पहुँचने का शरफ़ ही मिलता
मेरी मिट्टी से जो पैमाना बनाया होता
काश अल्लाह का घर जान के 'शो'ला' तुम ने
का'बा-ए-दिल को कलीसा न बनाया होता
ग़ज़ल
मा-सिवा से कहीं बेगाना बनाया होता
शोला करारवी

