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लुत्फ़-ए-बहार मुश्फ़िक़-ए-मन देखते चलो | शाही शायरी
lutf-e-bahaar mushfiq-e-man dekhte chalo

ग़ज़ल

लुत्फ़-ए-बहार मुश्फ़िक़-ए-मन देखते चलो

अरशद अली ख़ान क़लक़

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लुत्फ़-ए-बहार मुश्फ़िक़-ए-मन देखते चलो
बुलबुल का ढंग रंग-ए-चमन देखते चलो

बाँकों को बाँकपन को मिलाओ न ख़ाक में
तन तन के यूँ न अपना बदन देखते चलो

जाते अगर हो कूचा-ए-क़ातिल की सैर को
कपड़ा भी थोड़ा बहर-ए-कफ़न देखते चलो

चश्म-ए-बुतान-ए-दहर की आफ़त हैं शोख़ियाँ
सहरा-ए-हुस्न के भी हिरन देखते चलो

क्या कर रही है पेशा-ए-मश्शातगी बहार
आराइश-ए-उरूस-ए-चमन देखते चलो

करती है राह-ए-शौक़ में किस किस को पाएमाल
रफ़्तार-ए-यार के भी चलन देखते चलो

आए हो सैद-गाह-ए-जहाँ में तो ऐ 'क़लक़'
तर्ज़-ए-शिकार-ए-तीर-फ़गन देखते चलो