लीजिए ताबानी-ए-आलम के सामाँ हो गए
दिल के ज़र्रे उड़ के हर जानिब परेशाँ हो गए
दर्द-ए-तन्हाई से मर जाना तो कुछ मुश्किल न था
क्या कहें ग़म से मगर कुछ अहद-ओ-पैमाँ हो गए
इल्तिफ़ात-ए-दोस्त का मुमकिन नहीं कोई सिला
कम है जान-ओ-दिल जो सर्फ़-ए-शुक्र-ए-एहसाँ हो गए
तुझ से क्या लें इंतिक़ाम ऐ ख़ाक-ए-बे-बर्ग-ओ-नवा
वो कहाँ हैं मेहर-ओ-मह तुझ में जो पिन्हाँ हो गए
दावत-ए-जल्वा है फिर बर्क़-ए-निगाह-ए-नाज़ को
जम्अ' फिर हस्ती के अज्ज़ा-ए-परेशाँ हो गए
अब मैं समझा सीना-ए-सोज़ाँ के शक़ होने का राज़
आप पिन्हाँ क्या हुए गोया नुमायाँ हो गए
जिन को होना ही न था राह-ए-मोहब्बत में ग़ुबार
किस तरह वो ख़ाक के पुतले फिर इंसाँ हो गए
ख़ाक-ए-दिल के चंद ज़र्रे उड़ गए थे एक दिन
बन के तारे आसमानों पर दरख़्शाँ हो गए
कुछ ख़याल-ए-दोस्त आया था कि आ पहुँची बहार
जिस तरफ़ देखा गुलिस्ताँ ही गुलिस्ताँ हो गए
हुस्न ने रोज़-ए-अज़ल जब रुख़ से सरकाई नक़ाब
चंद जल्वे रंग बन कर बज़्म-ए-इम्काँ हो गए
छा रहा है रंग हर जानिब बहार-ए-हुस्न का
वा हैं जिन के दीदा-ए-दिल गुल-बदामाँ हो गए
रफ़्ता रफ़्ता आरज़ू-ए-रस्तगारी मिट गई
रह के ज़िंदाँ में 'जिगर' आज़ाद-ए-ज़िंदाँ हो गए
ग़ज़ल
लीजिए ताबानी-ए-आलम के सामाँ हो गए
जिगर बरेलवी

