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ले दाम-ए-निगाह-ए-यार आया | शाही शायरी
le dam-e-nigah-e-yar aaya

ग़ज़ल

ले दाम-ए-निगाह-ए-यार आया

दाऊद औरंगाबादी

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ले दाम-ए-निगाह-ए-यार आया
करने कूँ मुझे शिकार आया

क्यूँ आवे न मुझ बदन सूँ ख़ुश बास
मुझ बर में वो गुल-इज़ार आया

ख़त देख तेरे रुख़ ऊपर आग़ाज़
आईना ऊपर ग़ुबार आया

जिस बाज थी दिल कूँ बे-क़रारी
वो दिल का मिरे क़रार आया

ज़ाहिद ने अपस का ज़ोहद तक़्वा
कूचे में तेरे बिसार आया

निकला है रक़ीब-ए-गुल-बदन सात
ले गुल की पनाह ख़ार आया

मुझ पर्दा-ए-दिल पे साज़ कर ग़म
हो नाला मेरा सितार आया

शबनम नहीं हर सहर ऐ 'दाऊद'
तुझ ग़म सूँ गुल-ए-अश्क-बार आया