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लहू की आग अगर जलती रहेगी | शाही शायरी
lahu ki aag agar jalti rahegi

ग़ज़ल

लहू की आग अगर जलती रहेगी

ग़ुलाम हुसैन साजिद

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लहू की आग अगर जलती रहेगी
हमारी दाल भी गलती रहेगी

भरोसा है अगर दुनिया को हम पर
हमारे रंग में ढलती रहेगी

मोहब्बत है अगर सच्ची हमारी
मताअ-ए-ख़्वाब पर पलती रहेगी

चमन अब देर तक रक़्साँ रहेगा
हवा अब देर तक चलती रहेगी

कहाँ आएगी अपने वक़्त पर मौत
वो अगले रोज़ पर टलती रहेगी

जहाँ में सुर्ख़-रू हो कर भी 'साजिद'
वो हाथों को यूँही मलती रहेगी