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लगे ख़दंग जब उस नाला-ए-सहर का सा | शाही शायरी
lage KHadang jab us nala-e-sahar ka sa

ग़ज़ल

लगे ख़दंग जब उस नाला-ए-सहर का सा

मोमिन ख़ाँ मोमिन

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लगे ख़दंग जब उस नाला-ए-सहर का सा
फ़लक का हाल न हो क्या मिरे जिगर का सा

न जाऊँगा कभी जन्नत में मैं न जाऊँगा
अगर न होवेगा नक़्शा तुम्हारे घर का सा

करे न ख़ाना-ख़राबी तिरी नदामत-ए-जौर
कि आब-ए-शर्म में है जोश चश्म-ए-तर का सा

ये जोश यास तो देखो कि अपने क़त्ल के वक़्त
दुआ-ए-वस्ल न की वक़्त था असर का सा

लगे उन आँखों से हर-वक़्त ऐ दिल-ए-सद-चाक
तिरा न रुत्बा हुआ क्यूँ शिगाफ़-ए-दर का सा

ज़रा हो गर्मी-ए-सोहबत तो ख़ाक कर दे चर्ख़
मिरा सुरूर है गुल-ख़ंदा-ए-शरर का सा

ये ना-तवाँ हूँ कि हूँ और नज़र नहीं आता
मिरा भी हाल हुआ तेरी ही कमर का सा

जुनून के जोश से बेगाना-वार हैं अहबाब
हमारा हाल वतन में हुआ सफ़र का सा

ख़बर नहीं कि उसे क्या हुआ पर इस दर पर
निशान-ए-पा नज़र आता है नामा-बर का सा

दिल ऐसे शोख़ को 'मोमिन' ने दे दिया कि वो है
मुहिब हुसैन का और दिल रखे शिमर का सा