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लफ़्ज़ों के बरतने में बहुत सिर्फ़ हुआ मैं | शाही शायरी
lafzon ke baratne mein bahut sirf hua main

ग़ज़ल

लफ़्ज़ों के बरतने में बहुत सिर्फ़ हुआ मैं

इरफ़ान सत्तार

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लफ़्ज़ों के बरतने में बहुत सिर्फ़ हुआ मैं
इक मिस्र ताज़ा भी मगर कह न सका मैं

इक दस्त-ए-रिफ़ाक़त की तलब ले के बढ़ा में
अम्बोह तरहदार में इक शोर उठा मैं

आ तुझ को तक़ाबुल में उलझने से बचा लूँ
सब कुछ है तिरी ज़ात में बाक़ी जो बचा मैं

मैं और कहाँ ख़ुद-नगरी याद है तुझ को
जब तू ने मिरा नाम लिया मैं ने कहा में

मैं एक बगूला सा उठा दश्त-ए-जुनूँ से
रोका मुझे दुनिया ने बहुत पर न रुका मैं

या मुझ से गुज़ारी न गई उम्र-ए-गुरेज़ाँ
या उम्र-ए-गुरेज़ाँ से गुज़ारा न गया में

मालूम हुआ मुझ में कोई रम्ज़ नहीं है
इक उम्र-ए-रियाज़त से गुज़रने पे खुला मैं

जो रात बसर की थी मिरे हिज्र में तू ने
उस रात बहुत देर तिरे साथ रहा मैं