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लाख मुझे दोश पे सर चाहिए | शाही शायरी
lakh mujhe dosh pe sar chahiye

ग़ज़ल

लाख मुझे दोश पे सर चाहिए

राशिद मुफ़्ती

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लाख मुझे दोश पे सर चाहिए
सैल-ए-बला को मिरा घर चाहिए

ज़ाद-ए-सफ़र से कहीं कटती है राह
दिल में फ़क़त शौक़-ए-सफ़र चाहिए

ख़ैर हो ताबानी-ए-ख़ुर्शीद की
शब के दुलारों को सहर चाहिए

अब ये तलब है कि हवस छोड़िए
पेड़ नहीं मुझ को समर चाहिए

माँगते हैं वो भी ज़मीं से मुराद
सू-ए-फ़लक जिन की नज़र चाहिए

अब उन्हें साहिल न डुबो दे जिन्हें
पार उतरने को भँवर चाहिए

मुझ को तो है ख़ाना-ख़राबी पसंद
आप कहें किस लिए घर चाहिए

मुझ सा भी मेआर-तलब कौन है
दुख भी मुझे कोई अमर चाहिए

कुछ नहीं आता तो ख़ुशामद ही सीख
हाथ में कोई तो हुनर चाहिए

पूछ तो लूँ राहज़न-ए-वक़्त से
मेरी कला या मिरा सर चाहिए

तेग़ की 'राशिद' थी ज़रूरत मुझे
मैं ये समझता था सिपर चाहिए