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लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम | शाही शायरी
lakh aawara sahi shahron ke fuTpathon pe hum

ग़ज़ल

लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम

जाँ निसार अख़्तर

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लाख आवारा सही शहरों के फ़ुटपाथों पे हम
लाश ये किस की लिए फिरते हैं इन हाथों पे हम

अब उन्हीं बातों को सुनते हैं तो आती है हँसी
बे-तरह ईमान ले आए थे जिन बातों पे हम

कोई भी मौसम हो दिल की आग कम होती नहीं
मुफ़्त का इल्ज़ाम रख देते बरसातों पे हम

ज़ुल्फ़ से छनती हुई उस के बदन की ताबिशें
हँस दिया करते थे अक्सर चाँदनी रातों पे हम

अब उन्हें पहचानते भी शर्म आती है हमें
फ़ख़्र करते थे कभी जिन की मुलाक़ातों पे हम