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ला-मकाँ नाम है उजड़े हुए वीराने का | शाही शायरी
la-makan nam hai ujDe hue virane ka

ग़ज़ल

ला-मकाँ नाम है उजड़े हुए वीराने का

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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ला-मकाँ नाम है उजड़े हुए वीराने का
हू के आलम में है मस्कन तिरे दीवाने का

शौक़-ए-रुस्वा कोई देखे तिरे दीवाने का
ख़ुद वो आग़ाज़ बना है किसी अफ़्साने का

जाम-ए-दिल बादा-ए-उल्फ़त से भरा रहता है
वाह क्या ज़र्फ़ है टूटे हुए पैमाने का

दास्ताँ इश्क़ की है पूरी सुनाएँगे कलीम
क़िस्सा तूर तो इक बाब है अफ़्साने का

शम्अ' ने बज़्म में जल जल के जलाया आख़िर
आह क्या हश्र हुआ इश्क़ में परवाने का

मुस्ततर क़ुलक़ुल-ए-मीना में है राज़-ए-मस्ती
भेद किस तरह खुले फिर तिरे मस्ताने का

हश्र में देख के मजमा' लब-ए-कौसर साक़ी
फिर गया आँखों में नक़्शा तिरे मयख़ाने का

मिलते ही साग़र-ओ-शीशा से छलक जाता है
ये भी क्या दौर है साक़ी तिरे पैमाने का

क्या क़यामत है कि महशर में भी पुर्सिश न हुई
हश्र अब देखिए क्या हो तिरे दीवाने का

सफ़हा दिल मिरा आईना-ए-रम्ज़-ए-तौहीद
राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा मिरे अफ़्साने का

'शौक़' अब किस लिए फ़िक्र-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना है
भरने वाला तो कोई और है पैमाने का