क्यूँ न हो दाद-तलब हिम्मत-ए-मर्दाना-ए-दिल
माइल-ए-हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ है परवाना-ए-दिल
एक इबरत का मुरक़्क़ा' है अलम-ख़ाना-ए-दिल
हसरत-ओ-यास का अफ़्साना है अफ़्साना-ए-दिल
जिस को रहती है किसी और के जल्वे की तलाश
उस ने देखा ही नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिल
अब मैं समझा कि मोहब्बत में असर है कितना
लोग सुनते हैं बड़े शौक़ से अफ़्साना-ए-दिल
क़ाबिल-ए-दाद है ये शौक़-ए-तलब ऐ साक़ी
ले के आया हूँ मैं टूटा हुआ पैमाना-ए-दिल
इक ज़माने को जिला देता है जल कर ऐ 'अर्श'
शोला-ए-बर्क़-ए-जहाँ-सोज़ है परवाना-ए-दिल
ग़ज़ल
क्यूँ न हो दाद-तलब हिम्मत-ए-मर्दाना-ए-दिल
अर्श मलसियानी

