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क्यूँ न हो दाद-तलब हिम्मत-ए-मर्दाना-ए-दिल | शाही शायरी
kyun na ho dad-talab himmat-e-mardana-e-dil

ग़ज़ल

क्यूँ न हो दाद-तलब हिम्मत-ए-मर्दाना-ए-दिल

अर्श मलसियानी

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क्यूँ न हो दाद-तलब हिम्मत-ए-मर्दाना-ए-दिल
माइल-ए-हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ है परवाना-ए-दिल

एक इबरत का मुरक़्क़ा' है अलम-ख़ाना-ए-दिल
हसरत-ओ-यास का अफ़्साना है अफ़्साना-ए-दिल

जिस को रहती है किसी और के जल्वे की तलाश
उस ने देखा ही नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिल

अब मैं समझा कि मोहब्बत में असर है कितना
लोग सुनते हैं बड़े शौक़ से अफ़्साना-ए-दिल

क़ाबिल-ए-दाद है ये शौक़-ए-तलब ऐ साक़ी
ले के आया हूँ मैं टूटा हुआ पैमाना-ए-दिल

इक ज़माने को जिला देता है जल कर ऐ 'अर्श'
शोला-ए-बर्क़-ए-जहाँ-सोज़ है परवाना-ए-दिल