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क्यूँ ख़ुद-बख़ुद फिरी निगह-ए-यार क्या सबब | शाही शायरी
kyun KHud-baKHud phiri nigah-e-yar kya sabab

ग़ज़ल

क्यूँ ख़ुद-बख़ुद फिरी निगह-ए-यार क्या सबब

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

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क्यूँ ख़ुद-बख़ुद फिरी निगह-ए-यार क्या सबब
क्यूँ सर-निगूँ है अब्रू-ए-ख़म-दार क्या सबब

क़िस्मत पलट गई कि नसीबा उलट गया
क्यूँ ख़ुद-बख़ुद फिरी निगह-ए-यार किया सबब

क्या आ गया क़रीब ज़माना विसाल का
क्यूँ बे-क़रार है ये दिल-ए-ज़ार क्या सबब

ताक़त कहाँ से आ गई इस ना-तवाँ में आज
दम तोड़ता जो है दिल-ए-बीमार क्या सबब

किस से लड़ी निगाह ये किस पर इताब है
होते हैं बंद रौज़न-ए-दीवार क्या सबब

फ़ुर्क़त की रात रोज़-ए-क़यामत कहीं न हो
होती नहीं जो सुब्ह-ए-शब-ए-तार क्या सबब

'अंजुम' गए थे उन को सुनाने की वास्ते
फिर हाल-ए-दिल किया जो न इज़हार क्या सबब