क्यूँ आश्ना-ए-ग़म दिल-ए-वहशत-असर नहीं
मानूस-ए-इल्तिफ़ात वो ज़ालिम अगर नहीं
मैं हूँ तलाश-ए-राह-ए-मोहब्बत है दश्त है
साया नहीं निशान नहीं हम-सफ़र नहीं
फिर राह-रौ से लेता हूँ मंज़िल का कुछ सुराग़
सब राहबर हैं मेरे कोई राहबर नहीं
फिर अंदलीब-ए-ज़ार ने तिनके उठा लिए
शायद चमन उजड़ने की इस को ख़बर नहीं
मैं और जाम-ओ-नग़्मा-ओ-मुतरिब से वास्ता
ख़ुश हूँ कि मेरा बज़्म-ए-तरब में गुज़र नहीं
क्यूँ जल न जाए ताब-ए-रुख़-ए-यार देख कर
दिल है ये कोई चश्म-ए-हक़ीक़त-निगर नहीं
औराक़-ए-दो-जहाँ पे जो तहरीर हो सके
इतना मिरा फ़साना-ए-ग़म मुख़्तसर नहीं
ज़ब्त-ए-जुनूँ ने ढाई हैं दिल की इमारतें
अब इस दयार में कोई दीवार-ओ-दर नहीं
दिल को सुपुर्द करते हैं अपना पयाम-ए-जाँ
ये मो'तबर नहीं तो कोई मो'तबर नहीं
पैवस्त हों न जिस में ज़माने के दिल 'जिगर'
कुछ और है वो आप का तीर-ए-नज़र नहीं
कैसी दुआ कहाँ का असर किस का मुद्दआ'
कुछ आग के सिवा मिरे दिल में 'जिगर' नहीं
ग़ज़ल
क्यूँ आश्ना-ए-ग़म दिल-ए-वहशत-असर नहीं
जिगर बरेलवी

