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क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है | शाही शायरी
kya tang hum sitam-zadagan ka jahan hai

ग़ज़ल

क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है

मिर्ज़ा ग़ालिब

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क्या तंग हम सितम-ज़दगाँ का जहान है
जिस में कि एक बैज़ा-ए-मोर आसमान है

है काएनात को हरकत तेरे ज़ौक़ से
परतव से आफ़्ताब के ज़र्रे में जान है

हालाँकि है ये सीली-ए-ख़ारा से लाला रंग
ग़ाफ़िल को मेरे शीशे पे मय का गुमान है

की उस ने गर्म सीना-ए-अहल-ए-हवस में जा
आवे न क्यूँ पसंद कि ठंडा मकान है

क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसा नहीं दिया
बस चुप रहो हमारे भी मुँह में ज़बान है

बैठा है जो कि साया-ए-दीवार-ए-यार में
फ़रमाँ-रवा-ए-किश्वर-ए-हिन्दुस्तान है

हस्ती का ए'तिबार भी ग़म ने मिटा दिया
किस से कहूँ कि दाग़ जिगर का निशान है

है बारे ए'तिमाद-ए-वफ़ा-दारी इस क़दर
'ग़ालिब' हम इस में ख़ुश हैं कि ना-मेहरबान है

देहली के रहने वालो 'असद' को सताओ मत
बे-चारा चंद रोज़ का याँ मेहमान है