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क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम | शाही शायरी
kya sitam kar gai ai dost teri chashm-e-karam

ग़ज़ल

क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम

रविश सिद्दीक़ी

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क्या सितम कर गई ऐ दोस्त तिरी चश्म-ए-करम
जैसे तेरे नहीं दुनिया के गुनहगार हैं हम

कोई आलम हो बहर-हाल गुज़र जाता है
हम न सरगश्ता-ए-राहत हैं न आशुफ़्ता-ए-ग़म

तिरी ज़ुल्फ़ों की घनी छाँव बहुत दूर सही
जादा-पैमा हैं हवादिस की कड़ी धूप में हम

निकहत-ए-गुल से कुछ इस तरह मुलाक़ात हुई
याद आया तिरी बेगाना-वशी का आलम

हम हैं तूफ़ान-ए-मलामत है गली है तेरी
हुस्न-ए-तक़दीर से होते हैं ये हालात बहम

ले गया इश्क़ किसी शाहिद-ए-नादीदा तक
मुद्दतों ज़ौक़-ए-परस्तिश ने तराशे थे सनम

हम ने हर उक़्दा-ए-दुश्वार का मुँह चूम लिया
कितने दिलकश हैं तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर के ख़म

कू-ए-क़ातिल ही सही मंज़िल-ए-राहत न सही
थक के बैठे हैं कि आते हैं बहुत दूर से हम

कू-ए-जानाँ में कहीं आज तो हम भी थे 'रविश'
शुक्र है हम को न पहचान सके दैर ओ हरम