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क्या रोके क़ज़ा के वार तावीज़ | शाही शायरी
kya roke qaza ke war tawiz

ग़ज़ल

क्या रोके क़ज़ा के वार तावीज़

अमीर मीनाई

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क्या रोके क़ज़ा के वार तावीज़
क़िल'अ है न कुछ हिसार तावीज़

चोटी में है मुश्क-बार तावीज़
या फ़ित्ना-ए-रोज़गार तावीज़

दोनों ने न दर्द-ए-दिल मिटाया
गंडे का है रिश्ता-दार तावीज़

क्या नाद-ए-अली में भी असर है
चारों टुकड़े हैं चार तावीज़

डरता हूँ न सुब्ह हो शब-ए-वस्ल
है महर वो ज़र-निगार तावीज़

हम को भी हो कुछ उमीद-ए-तस्कीं
खोए जो तप-ए-ख़यार तावीज़

पत्तां को जड़ हमारी पहुँची
गाड़ा तह-ए-पा-ए-यार तावीज़

हाजत नहीं उन को नौ-रतन की
बाज़ू पे हैं पाँच चार तावीज़

खटके वो न आए फ़ातिहे को
देखा जो सर-ए-मज़ार तावीज़

पी जाएँगे घोल कर किसे आप
है नक़्श न ख़ाकसार तावीज़

ऐ तुर्क टलें बलाएँ सर से
इक तेग़ का ख़त-ए-हज़ार तावीज़

डर है तुम्हें कंकनों से लाज़िम
लाया तो है सादा-कार तावीज़

इक्सीर का नुस्ख़ा इस को समझूँ
खोए जो तिरा ग़ुबार तावीज़

मजमा है 'अमीर' की लहद पर
मेले का है इश्तिहार तावीज़