क्या क्या ब-दस्त-ए-ग़ैब सभी ने लिया न था
लेकिन मिरी वफ़ा का कोई भी सिला न था
आवाज़ा-ए-रक़ीब से उलझे हैं बार बार
तुझ से शिकायतों का मगर हौसला न था
उस की नवाज़िशों पे न इतराओ दोस्तो
मुझ पर करम वो था कि किसी पर हुआ न था
लेते हैं बार बार वो ऐसे ख़ुदा का नाम
दुनिया में जैसे और किसी का ख़ुदा न था
रस्ते दयार-ए-दिल के भी कितने अजीब थे
सब राह-रौ थे कोई यहाँ रहनुमा न था
दिल ने तो अपनी बात कही सब के रू-ब-रू
दिल था मुनाफ़िक़त से कभी आश्ना न था
शीशा-गरों ने उस की बसीरत भी छीन ली
आँखें थीं उस के पास मगर देखता न था
नादीदा मंज़िलों के मुसाफ़िर थे कितने लोग
चलना था जिन का काम मगर आसरा न था
क्या बुझ गए थे मेरे ही घर के सभी चराग़
या शहर भर में दिया भी जला न था
उस गुल का आब-ओ-रंग ही था रू-कश-ए-बहार
जो गुल दरून-ए-शाख़ था लेकिन खिला न था
क़ातिल तो और भी थे बहुत शहर-ए-दर्द में
तुझ सा मगर 'जमील' कोई दूसरा न था
ग़ज़ल
क्या क्या ब-दस्त-ए-ग़ैब सभी ने लिया न था
जमील मलिक

